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Showing posts from February, 2017

गुलाब की खेती

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गुलाब की खेती से कमा सकते हैं मोटा मुनाफा  गुलाब की खेती करके किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं। फूलों की बढ़ती मांग और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बड़ी फूल मंडी उपलब्ध होने से इनकी बिक्री की कोई समस्या नहीं है। जैसे फलों का राजा आम है तो फूलों की बेगम गुलाब है। गुलाब का रंग व सुगंध सबके मन को मोह लेते हैं। गुलाब के फूलों से गुलकंद, गुलाब जल, तेल, इत्र, जैम, जैली पेय पदार्थ बनाए जाते हैं। फूलों की डंडी व गुलदस्ते बड़े पसंद किए जाते हैं। नवीनतम तकनीक से गुलाब की अच्छी पैदावार ली जा सकती है l  गुलाब की खेती बहुत पहले से पूरी दुनिया में की जाती हैI इसकी खेती पूरे भारतवर्ष में व्यवसायिक रूप से की जाती हैI गुलाब के फूल डाली सहित या कट फ्लावर तथा पंखुड़ी फ्लावर दोनों तरह के बाजार में व्यापारिक रूप से पाये जाते हैI गुलाब की खेती देश व् विदेश निर्यात करने के लिए दोनों ही रूप में बहुत महत्वपूर्ण हैI गुलाब को कट फ्लावर, गुलाब जल, गुलाब तेल, गुलकंद आदि के लिए उगाया जाता हैI गुलाब की खेती मुख्यतः कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्रा, बिहार, पश्चिम बंगाल ,गुजरात, हरियाणा, पंज...

मशरूम खेती

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मशरूम उत्पादन : रोजगार का साधन मशरूम विशेष प्रकार की फफूंदों का फलनकाय है, जिसे फुटु, छत्तरी, भिभौरा, छाती, कुकुरमुत्ता, ढिगरी आदि नामों से जाना जाता है। मशरूम खेतों में, मेढ़ों में, वनों में प्राकृतिक रूप से विभिन्न प्रकार के माध्यमों में निकलते है। इनमें खाद्य, अखाद्य, चिकित्सीय, जहरीले एव अन्य मशरूम होते है। खाद्य मशरूम ग्रामीणों द्वारा बहुतायत में पसंद किये जाते है। वैज्ञानिकों ने इन जंगली मशरूमों को एकत्र कर प्रयोगशाला में इनके विकास का पूर्णरूपेण अध्ययन किया एवं इनकी उत्पादन विधि विकसित की। आज अनेक प्रकार के मशरूम को न केवल प्रयोगशाला में उगाया जा रहा है, वरन उनकी व्यावसायिक खेती कर उनका निर्यात एवं आयात कर कृषि अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जा रहा है। मशरूम उत्पादन में भारतवर्ष पिछड़ा है। यहाँ पर मशरूम अनुसंधान एवं उत्पादन वृद्धि दर संतोषप्रद है भारतवर्ष में आज लगभग 1.00 लाख टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है, जिसमें 85 प्रतिशत हिस्सा सफ़ेद बटन मशरूम का है। दूसरे क्रम में आयस्टर, पैरा मशरूम एवं दूधिया मशरूम है। मशरूम क्या है? मशरूम “कुकुरमुत्ता” नहीं अपितु फफूंदों का फलनकाय है, जो...

मुर्गीपालन

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मुर्गीपालन ब्यवसाय एक ऐसा व्यवसाय है जो आपकी आय का अतिरिक्त साधन बन सकता है। बहुत कम लागत से शुरू होने वाला यह व्यवसाय लाखों-करोड़ों का मुनाफा दे सकता है। इसमें शैक्षणिक योग्यता और पूंजी से अधिक   अनुभव और मेहनत की दरकार होती है. आज के समय में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है। ऐसे में युवा मुर्गीपालन को रोजगार का माध्यम बना सकते हैं ।        अगर आपके पास औरों से अलग सोचने की क्षमता है, तो आप मुर्गीपालन ब्यवसाय से भी करोड़ों का मुनाफा कमा सकते हैं। मुर्गीपालन ब्यवसाय एक ऐसा व्यवसाय है जिसे बहुत कम लागत से शुरू करके लाखों- करोड़ों रुपए का लाभ कमा सकते हैं। सुगुना पोल्ट्री के बी सौदारराजन और जीबी सुंदरराजन का उदाहरण सबके सामने है। इन्होंने मुर्गीपालन ब्यवसाय के बहुत छोटे से अपनी शुरुआत की और देखते ही देखते उनका यह मुर्गीपालन ब्यवसाय 4200 करोड़ की कंपनी में बदल गया। और तो और इस कंपनी ने 18 हजार किसानों को भी आय का बेहतर अवसर प्रदान किया। भारत में पोल्ट्री की शुरुआत मुख्यतया 1960 से हुई। पिछले तीन दशकों में मुर्गीपालन ब्यवसाय ने उद्योग का रूप ले लिया है। ...

बतख पालन

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खेती में प्रति हेक्टेयर लागत दिनोंदिन बढ़ रही है. लिहाजा साथ में कोई और कामधंधा कर के आमदनी बढ़ाना लाजिम है. इस लिहाज से बतखपालन का काम किया जा सकता?है. हालांकि पोल्ट्री के धंधे में ज्यादातर लोग मुरगियां पालते हैं, लेकिन देश की कुल पोल्ट्री में करीब 10 फीसदी हिस्सा बतखों का है. यदि बेहतर तरीके से बतखें पाली जाएं तो फायदा ज्यादा हो सकता है. मुरगियों के मुकाबले बतखें पालना किफायती व फायदेमंद है, क्योंकि ये दड़बों के अंदर कम रहती हैं और मुरगियों के मुकाबले कम दाना खाती हैं. बतखों के चूजों को कम दिनों तक सेया जाता है. प्रति बतख अंडा देने की सालाना कूवत करीब 200 है, जो मुरगियों के मुकाबले करीब 2 गुनी है. साथ ही बतख के अंडे का वजन 70 ग्राम तक होता है, जबकि मुरगी का अंडा औसतन 55 ग्राम का होता है. लिहाजा बतखपालन से कम लागत में ज्यादा लाभ मिलता है. सिर्फ चौथाई एकड़ के पोखर में 20-25 बतखें पाली जा सकती हैं. खुले में बतख पालने से उन्हें मनचाहा खाना ज्यादा मिलता है, लिहाजा अंडे भी ज्यादा मिलते हैं. बतखें 2 साल तक अंडे देती हैं. नए चूजों को अलग रख कर बतखों के समूह बनाए जा सकते हैं, ताकि हर ...

मछली पालन कैसे करेें ?

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मत्स्य पालन तकनीक   मत्स्य पालन तकनीक जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के परिणाम स्वरूप रोजी-रोटी की समस्या के समाधान के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि आज के विकास-शील युग में ऐसी योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाय जिनके माध्यम से खाद्य पदार्थों के उत्पादन के साथ-साथ भूमिहीनों, निर्धनों, बेरोजगारों, मछुआरों आदि के लिये रोजगार के साधनों का सृजन भी हो सके। उत्तर प्रदेश एक अर्न्तस्थलीय प्रदेश है जहाँ मत्स्य पालन और मत्स्य पालन और मत्स्य उत्पादन की दृष्टि से सुदूरवर्ती ग्रामीण अंचलों में तालाबों व पोखरों के रूप में तमाम मूल्यवान जल सम्पदा उपलब्ध है। मछली पालन का व्यवसाय नि:सन्देह उत्तम भोजन और आय का उत्तम साधन समझा जाने लगा है तथा इस आश्य की जानकारी परम आवश्यक है कि मछली का उच्चतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए कौन-कौन सी व्यवस्थायें अपनायी जायें ? मत्स्य पालन तकनीक के विषय में मत्स्य पालकों के लिए उपयोगी जानकारी निम्न प्रकार है :- तालाब का चयन मत्स्य पालन हेतु 0.2 से 2.00 हेक्टर तक के ऐसे तालाबों का चुनाव किया जाना चाहिए जिनमें कम से कम वर्ष में 8-9 माह अथवा वर्ष भर पानी बना...

मोती की खेती

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मोती की खेती से हर महीने कमाएं 1 लाख रुपए, सरकार कर रही है मदद .... (Writing By Kamesh Suryavanshi - 9691160601) अगर आप छोटे से इन्‍वेस्‍टमेंट से लाखों कमाना चाहते हैं तो आपके लिए मोती की खेती एक बेहतर  विकल्‍प हो सकती है। मोती की मांग इन दिनों घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में काफी अधिक है, इसलिए इसके अच्‍छे दाम भी मिल रहे हैं। आप महज 2 लाख रुपए के इंन्‍वेस्‍ट से इससे करीब डेढ़ साल में 20 लाख रुपए यानी हर महीने 1 लाख रुपए से अधिक की कमाई कर सकते हैं।                         20 हजार रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से शुरू हो सकती है खेती -मोती की खेती उसी प्रकार से की जाती है जैसे मोती प्राकृतिक रूप से तैयार होता है। यहां भी आपको सीप से ही मोती बनाना है। -मोती की खेती करने के लिए इसे छोटे स्‍तर पर भी शुरू किया जा सकता है। इसके लिए आपको 500 वर्गफीट का तालाब बनाना होगा। -तालाब में आप 100 सीप पालकर मोती उत्‍पादन शुरू कर सकते हैं। प्रत्‍येक सीप की बाजार में कीमत 15 से 25 रुपए होती है। -इसके लिए स्‍ट्रक्‍च...