एलोवेरा का करें बिजनेस, 50 हजार इन्वेस्ट कर 10 लाख तक कमाने का मौका...

औषधीय फसल एलोविरा की खेती केसे करे इसके बारे में जानेंगे

(कामेश सूर्यवंशी @9691160601)
Aloevera ki kheti ke bare me
एलोवीरा का पोधा

परिचय:-

एलोविरा की उत्त्पति का स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है।इसे कई नामो से जाना जाता है। जैसे घृतकुमारी, ग्वारपाटा, अग्रेजी में एलॉय नाम से भी जाना जाता है। ग्वारपाटा के पोधे की ऊचाई 60- 90 से.मी.तक होती है। पत्तो की लम्बाई 30-45 सेमी. तक होती है। पत्ते 4.5सेमी से 7.5सेमी तक होते है। जड़ से उपर सतह के साथ ही पत्ते निकलने लगते है। पत्तो का रंग हरा होता है। और पत्तो की किनारों पर छोटे छोटे काटे जैसे होते है। अलग अलग रोगों के हिसाब से इसकी कई सारी प्रजातिया है।

एलोवीरा का उपयोग:- 

Aloevera में कई सारे औषधीय गुण होते है।इसलिए इसका उपयोग आयुवेदिक में बड़े पैमाने से होता आ रहा है। आज के दोर में कई सारी नेशनल और इंटर नेशनल कंपनियाँ इसका उपयोग चिकित्सा के साथ साथ सौंदर्य प्रसाधन के जैसे फेसवास क्रीम शेम्पू  दन्त पेस्ट अन्य कई सारे product में इसका इस्तेमाल होता है।इसलिए इसकी मांग बडने लगी है। यह पोधा गमले में भी अच्छी तरह से चलता है। मैने भी इसे अपने घर पर लगा रखा है। क्यों की यह जलने पर इसके पत्तो में से गुद्दा और रस लगाने से काफी ज्यादा relif मिलती है।कई सारे लोग इसे मकानों की छत और gardan में शोकियाना तोर पर भी लगाते है। इसकी बढती मांग की वजह से इसकी खेती व्यावसायिक रूप में शुरू हो गयी है।

एलोवेरा की खेती कैसे करे ?

वेसे एलोविरा के पौधे किसी भी प्रकार की उपजाऊ अनुपजाऊ मिट्टी में आसानी से उग जाते है।बस आपको बस एक बात का ध्यान रखना है की पोधा अधिक जल भराव और पाला पड़ने वाली जगह पर नही लगाना है।सबसे पहले खेत की 2 बार अच्छे से जुताई कर उसमे प्रति हेक्टेयर 10 से 20 टन के बीच में अच्छी पकी हुई गोबर की खाद डाले साथ में 120 किलोग्राम यूरिया+150किलोग्राम फास्फोरस+30किलोग्राम पोटाश इनको खेत में समान रूप से बिखेर देवे फिर एक बार हलकी जुताई करा के पाटा लगा कर मिट्टी को समतल बना ले। फिर खेत में 50×50 सेमी. की दूरी पर उठी हुई क्यारी बना ले।
पोधो की रोपाई एवं रखरखाव:- 
पोधो की रोपाई किसी भी समय की जा सकती है। लेकिन अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए जून जुलाई और फरवरी से मार्च के बीच कर सकते है। एलोवीरा की रोपाई प्रकंदों से होती है इसलिए उनकी लम्बाई 10 से 15 सेमी के होने चाहिए। अच्छी उपज के लिए अनुशासित किस्में  सिम-सितल एल 1,2,5 और 49 है।जिसमे जेल की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। प्रकंदों की दुरी 50×50 रख के बीच में दुरी 30सेमी की रख कर रोपाई करनी चाहिए।

घर्तकुमारी की सिचाई:- 

सालभर में इसे मात्र 4 या 5 बार सिचाई की आवश्यकता होती है। सिचाई के लिए स्प्रिकलर और ड्रीप प्रणाली अच्छी रहती है। इससे इसकी उपज में बढ़ोत्तरी होती है।गर्मी के दिनों में  25 दिनों के अंतराल में सिचाई करनी चाहिए।
निदाई गुड़ाई:- 
खतपतवार की स्थिति देख कर निदाई गुड़ाई आवश्यक हो जाती है वर्ष भर में 3 या 4 निदाई करनी चाहिये निदाई के बाद पोधो की जड़ो में मिट्ठी चढ़ानी चाहिए ताकि पौधे गिरे नही।
रोग और किट नियन्त्रण:-
वेसे तो इस फसल पर कोई विशेष किट और रोगों का प्रभाव नही होता है।लेकिन कही कही तनो के सड़ने और पत्तो पर दब्बो वाली बीमारियाँ का असर देखा गया है।जो एक फफूंद जनक रोग होता है उसके उपचार के लिए मेंन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिडकाव करना चाहिए।
एलोविरा की कटाई और उत्पादन:-
यह फसल एक वर्ष बाद काटने योग्य हो जाती है। कटाई के दौरान पोधो की सबसे पहले निचली ठोस 3 या 4 पत्तो की कटाई करे उसके उपरांत लगभग एक महीने के बाद उस से उपर वाली पत्तियों की कटाई करनी चाहिए कभी भी उपर की नई नाजुक पत्तियों की कटाई नही करे। कटे हुए पत्तों में फिर से नई पत्तिया बननी शुरू हो जाती है।प्रति हेक्टेयर 50 से 60 टन ताजी पत्तिया प्रतिवर्ष मिल जाती है। दूसरे वर्ष में 15 से 20 प्रतिशत वर्धी होती है। बाज़ार में इन पत्तियों की बाजार में अनुमानित कीमत 3 से 6 रूपये किलो होती है। एक स्वस्थ पोधे की पत्तियो का वजन 3 से 5 किलो तक हो जाता है।

कटाई के बाद प्रबंधन और प्रसस्करण:-

एलोविरा का उपयोग
स्वस्थ पत्तियों की कटाई के बाद साफ़ पानी से धो कर पत्तियों के निचले हिस्से में ब्लेड या चाकू से कट लगा कर थोड़े समय के लिए छोड़ देते है। जिसमे से पीले रंग का गाडा चिपचिपा प्रदार्थ-रस (जेल) निकलता है उसे एक पात्र में इक्कठा कर के वाष्पीकरण विधि से इस रस को सुखा लिया जाता है।इस सूखे हुए रस को जातिगत और अलग अलग विधि से तेयार करने के बाद अलग अलग नामों से जाना जाता है। जैसे सकोत्रा,केप,जंजीवर,एलोज,अदनी आदि ।
एलोविरा की खेती करने के क्या फ़ायदा है:-
*इसकी खेती किसी भी जमींन पर आसानी से की जा सकती है।
*कम खर्च और और सस्ती खेती। गरीबी किसान को फ़ायदा।
*सिचाई और दवाई का कम खर्च।
*बंजर और अनूउपयोगी जमीन का उपयोग हो जाता है।
*इसे कोई भी पशु नही खाता है इसे खेत की मेड पर चारों तरफ लगाने से दूसरी फसल की भी सुरक्षा हो जाती है
*एक बार लगाने के बाद 5 सालों तक आसानी से फसल ले सकते है।
*अन्य फसलो की तुलना में मिट्टी का हास कम होता है।9691160601


 फसलों से संबधित अन्य किसी भी जानकारी के लिए संपर्क करे
 कामेश सूर्यवंशी - @9691160601
 (फ़ार्मिंग एक्सपर्ट /लाइफ कोच /लॉजिक गुरु /मोटीवेशनल स्पीकर  )

Comments

  1. Sir सर मेरे पास ढाई एकड़ सुख ई कृषि भूमि है क्या मैं उस पर एलोवेरा की खेती कर सकता हो और उसे एमपी में कहां बेचा जा सकता है

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